नेपाल—भारत सम्बन्ध

नेपाल—भारत सम्बन्ध
डा. निर्मलमणि अधिकारी
काठमांडू विश्वविद्यालय
नेपाल

नेपाल के लिए भारत और भारत के लिए नेपाल से ज्यादा स्वाभाविक एवं निकट मित्र कोइ हो ही नहीं सकता । धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक हर दृष्टिकोण से जुडे हुए नेपाल और भारत जैसी सह–अस्तित्वमूलक सम्बन्ध की दूसरी मिसाल संभवतः पूरे संसार में नहीं मिलेगी । वैदिक सभ्यता के सह–उत्तराधिकारी एवं बृहद् भारतवर्षीय संस्कृति के सहजीवी होने के कारण आधुनिक राज्य के रूप में नेपाल और भारत के बीच में सरकार व जनता दोनों स्तर पर सम्बन्ध में सहृदयता होना ही स्वाभाविक है । लेकिन व्यावहारिक यथार्थ कुछ और कहती है ।
अब भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी मोदी की सरकार की पहल से आनेवाली सकारात्मक छवि की अपेक्षा अपनी जगह है । लेकिन अभी तक की छवि को देखें तो नेपाल में आम तौर पर यही माना जाता है कि भारत में दश साल तक राज करनेवाला यु.पी.ए. सरकार के दौरान नेपाल सम्बन्ध का पूरा जिम्मेवारी नौकरशाही और खुफिया एजेन्सी रा (RAW) के पास था । नेपाल में ये आशङ्का किया जाता है कि ऐसी प्रक्रिया की आरंभ संभवतः वाजपेजी सरकार के दौरान ही आरंभ हुआ था । इसको लेकर नेपालीयों को आश्वस्त करने की जिम्मेवारी भाजपा की वर्तमान सरकार की ही है ।
अब प्रतीक्षा है कि नेपाल और भारत में व्यावहारिक स्तर पर सहृदयता छा जाए ।

भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का नेपाल की राजकीय यात्रा को नेपाल में नेपाल—भारत सम्बन्ध में प्रतिमान परिवर्तन की आधारशिला के तौर पर देखा जा रहा है । प्रधानमन्त्री मोदी ने अपनी हार्दिकता एवं वक्तृत्व से उस घाव में मल्हमपट्टी किया है जो पूर्ववर्ती भारतीय सरकारों की गलत व्यवहार के चलते नेपाली जनमानस को कष्ट दे रहा था । उनकी यात्रा को पूरी तरह से सफल माना जाना चाहिए ।
प्रधानमन्त्री मोदी ने नेपाल यात्रा को राजकीय, कूटनयिक औपचारिकता में सीमित नहीं किया । इस भ्रमण में धार्मिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक तत्व भी भरपूर रहे । विशेषतः नेपाल की संविधान सभा को उन्हों ने जिस तरह से संबोधित किया उसके बाद पूरे नेपाल में प्रधानमन्त्री मोदी के लिए संमान की लहर चल पडी है । उन्हों ने अपना संबोधन नेपाली भाषा में प्रारंभ किया । मोदी ने नेपाल से अपना वैयक्तिक और धार्मिक जुडाव का इजहार तो किया ही, अपने वक्तव्य में उन्हों ने नेपाल की स्वतन्त्रता, सार्वभौमसत्ता एवं राष्ट्रिय स्वाभिमान के लिए बार बार सम्मान प्रकट किया । पशुपतिनाथ और बुद्ध की भूमि नेपाल के लिए उनका श्रद्धा का प्रकटीकरण ने लोगों को अभिभूत किया है ।
नेपाल के लिए भारत और भारत के लिए नेपाल से ज्यादा स्वाभाविक एवं निकट मित्र कोइ हो ही नहीं सकता । धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक हर दृष्टिकोण से जुडे हुए नेपाल और भारत जैसी सह–अस्तित्वमूलक सम्बन्ध की दूसरी मिसाल संभवतः पूरे संसार में नहीं मिलेगी । वैदिक सभ्यता के सह–उत्तराधिकारी एवं बृहद् भारतवर्षीय संस्कृति के सहजीवी होने के कारण आधुनिक राज्य के रूप में नेपाल और भारत के बीच में सरकार व जनता दोनों स्तर पर सम्बन्ध में सहृदयता होना ही स्वाभाविक है । लेकिन व्यावहारिक यथार्थ कुछ और कहती है ।
नेपाल और भारत के बीच में जनस्तर में रोटी—बेटी का सम्बन्ध अब भी कायम है लेकिन सरकारी स्तर पर देखें तो नेपाल—भारत सम्बन्ध को स्वाभाविक अवस्था में नहीं देखा जा सकता । १९९७ में तत्कालीन प्रधानमन्त्री आई. के. गुजराल के बाद भारत के किसी प्रधानमन्त्री ने १७ साल से नेपालका औपचारिक/राजकीय भ्रमण नहीं किया है । २००२ में तत्कालीन भारतीय प्रधानमन्त्री अटल विहारी वाजपेयी दक्षेस (सार्क) सम्मेलन में सहभागी होने के लिए काठमांडू जरुर आए थे, लेकिन वो द्विपक्षीय औपचारिक/ राजकीय भ्रमण नहीं था । इस से भी अचम्भे की बात ये है कि नेपाल—भारत संयुक्त आयोग की बैठक २३ साल से नहीं हो सका था, जिसके सह–अध्यक्ष नेपाल के परराष्ट्रमन्त्री और भारत के विदेशमन्त्री हैं । विदेशमन्त्री सुषमा स्वराज इस तथ्य से अवगत दिखीं । उन्हों ने सार्वजनिक वक्तव्य में इस तथ्य पर जोर दिया कि जो बैठक विगत २३ साल से बाधित था, वो मोदी सरकार बनते ही प्राथमिकता में रहा और सरकार बनने की दो माह के अन्दर वो इसके लिए नेपाल आईं ।
अब मोदी सरकार की पहल से आनेवाली सकारात्मक छवि की अपेक्षा अपनी जगह है । लेकिन अभी तक की छवि को देखें तो नेपाल में आम तौर पर यही माना जाता है कि भारत में दश साल तक राज करनेवाला यु.पी.ए. सरकार के दौरान नेपाल सम्बन्ध का पूरा जिम्मेवारी नौकरशाही और खुफिया एजेन्सी रा (RAW) के पास था । नेपाल में ये आशङ्का किया जाता है कि ऐसी प्रक्रिया की आरंभ संभवतः वाजपेजी सरकार के दौरान ही आरंभ हुआ था । इसको लेकर नेपालीयों को आश्वस्त करने की जिम्मेवारी भाजपा की वर्तमान सरकार की ही है ।
भारतीय नौकरशाही और खुफिया एजेन्सी रा (RAW) की छवि नेपाल में एक ऐसी विदेशी शक्ति की रूप में है जो नेपाल की जलसंपदा को हडपना चाहता है, जो नेपाल के सीमा पर अतिक्रमण को प्रोत्साहन देता है, जो नेपाल के आन्तरिक राजनीति में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करता है और इसके लिए राजनीतिक पार्टीयों को मदारी की तरह नचाता है, जो नेपाल में एक समुदाय विशेष को बरगलाकर व भौगोलिक क्षेत्र विशेष को अस्थिर कर के नेपाल को कमजोर कराने की फिराक में है । नेपाल में भारतविरोधी जनमानस गाहे बगाहे मुखर होता रहा है । काठमांडूस्थित भारतीय राजदूतावास को उसी खुफिया एजेन्सी का विस्तार भर मानने की जो छवि बनी है उसको भारतीय कूटनीति की सफलता कैसे माना जा सकता है ! नेपाल को सिर्फ सुरक्षा चुनौती की दृष्टिकोण से देखना और रणनीतिक योजना का हिस्सा भर मानना पूर्ववर्ती भारतीय सरकारों की नेपाल नीति का बहुत बडा गलती था ।
हमारे भारतीय मित्र जब कभी इस सच्चाइ से रुबरु होते हैं तो स्वाभाविक है कि उनको अचम्भा ही नहीं होता दिल में धक्का भी लगता है । बहुत सारे तो समझ ही नहीं पाते कि नेपाल में इस तरह की भारत विरोधी भावना उपजी कहाँ से ? जब तक इस तरह की भावना की मूल का पता नहीं चलेगा तब तक नेपाल—भारत सम्बन्ध अपनी स्वाभाविक स्थिति में नहीं लौट पाएगा । मेरे पर्यवेक्षण में नेपाल में व्याप्त भारत विरोधी भावना के पिछे तीन प्रमुख कारण हैं ।

पहला, नेपाल में वामपंथ (कम्युनिस्ट) की दबदबा रहा है और वामपंथीयों ने अपनी प्रोपागाण्डा की बल से भारत विरोध को राष्ट्रियताका पैमाना बनाने में बहुत हद तक सफलता भी प्राप्त कर लिया है ।

दूसरा, भारतीय मीडिया में नेपाल के बारे में प्रकाशित व प्रसारित होने वाले गलत तथ्यों से लोग आक्रोशित हो जाते हैं । बहुत बार देखा गया है कि किसी भारतीय व्यक्तिद्वारा अज्ञानतावश “नेपाल तो भारत का ही अंग था (अथवा है)” कह देना, प्रकाशन व प्रसारण में बुद्ध की जन्मस्थली के रूप में नेपाल को उल्लेख न करना और भारत को बुद्ध की जन्मस्थली बता देना, फिल्मों में नेपाली पात्र को हीन व हास्यास्पद अवस्था में प्रस्तुत करना इत्यादि घटनाओं से नेपाली जनमानस आहत हुआ है और भारत विरोधी भावना भडकी है ।

तीसरा, नेपाल—भारत सम्बन्ध के परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार व काठमांडूस्थित भारतीय राजदूतावास की गतिविधि के बारे में जो सार्वजनिक दृष्टि बनी है उससे भारत विरोधी भावना बढा है ।

प्रधानमन्त्री मोदी ने पहले और दूसरे कारणों को बहुत हद तक संबोधित किया । उन्हों ने नेपाली जनमानस को प्रत्यक्ष छुते हुए नेपाली लोगों की स्वतन्त्रता, सार्वभौमसत्ता एवं राष्ट्रियता के प्रति जो स्वाभिमान है उस के प्रति संमान दर्शाया । बुद्ध की जन्मभूमि नेपाल है, इस तथ्य को उन्हों ने कई बार उल्लेखित किया । अभी तक नेपाल में रोष था कि बुद्ध की जन्मभूमि को लेकर भारतीय सरकार गलत प्रचार करता है । लेकिन मोदी के पहल ने नेपालीयों की राष्ट्रवादी मानसिकता में मोदी की छवि अच्छे मित्र के रूप में गढा है ।
नेपाल में हाल के वर्षों में भारत विरोधी भावना इजाफा करने में प्रमुखतम रहा तीसरा कारण को निराकरण करने में मोदी सरकार को कुछ और समय लगेगा । काठमांडू में तैनात ज्यादातर भारतीय राजदूत नेपाल में गलत वजहों से सुर्खियों में रहे हैं । उन्हों ने नेपाल—भारत सम्बन्ध के सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक पक्षों को बिल्कुल नजरअन्दाज कर दिया । कई राजदूत तो किसी राजनीतिक दल की नेता की तरह सार्वजनिक भाषणबाजी करने के लिए भी मीडिया में सुर्खियों मे रहे । उन्हों ने नेपाल की आन्तरिक राजनीति में इतने छोटे स्तर में दखलअन्दाजी किया कि उस के लिए सूक्ष्म व्यवस्थापन माइक्रोमैनेजमेन्ट (Micromanagement) पदावली ही गढा गया ।
नेपाल—भारत सम्बन्ध के परिप्रेक्ष्य में भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार की कथनी और प्रारम्भिक करनी को नेपाल में बहुत ही उत्साहपूर्वक देखा जा रहा है । प्रधानमन्त्री मोदी की नेपाल भ्रमण और उसकी पूर्वतयारी स्वरूप विदेशमन्त्री सुषमा स्वराज की नेपाल आगमन को नेपाली मिडिया में जितना बडा कवरेज मिला और मिल रहा है वो बेवजह नहीं है । ऐसा माना जा रहा है कि नेपाल को सिर्फ सुरक्षा चुनौती की दृष्टिकोण से देखना और रणनीतिक योजना का हिस्सा भर मानने जैसा गलत दृष्टिकोण अब कायम नहीं रहेगा । मोदी सरकार से उम्मीद किया जा रहा था कि अब नेपाल—भारत सम्बन्ध में प्रतिमान परिवर्तन (paradigm shift पैराडाइम सिफ्ट) सच में होगी । प्रधानमन्त्री मोदी ने काठमांडू यात्रा के दौरान उस उम्मीद को सही तरह से सम्बोधित भी किया है । अब प्रतीक्षा है कि नेपाल और भारत में व्यावहारिक स्तर पर सहृदयता छा जाए ।
Note on 27 Spet. 2015:
Nepal feels that Indian Prime Minister Modi cheated Nepal. Nepal is facing blockade (NAKABANDI) by India sine few days.

3 Responses to “नेपाल—भारत सम्बन्ध”

  1. Gopal Thakur Says:

    आदरणीय अधिकारी जी,
    नमस्कार !
    आपका आलेख ठीक समय पर आया है । विषयवस्तु को आपने ठीक ढंग से उठाने का प्रयास किया है । दुर्भाग्य तो हमारा ही है कि हम देश को कभी सपांग समझ ही नहीं सके । यहाँ जो असंतुष्टियाँ अभी दिख पड़ी है, क्या हमने सच्चे मन से इसकी जड़ तक पहुँचने का प्रयास किया है । निश्चय ही हम अगर अपने परिवार के सदस्यों के मनोविज्ञान को नहीं समझेंगे तो कोई इसका फायदा तो उठाएगा ही ।
    जहाँ तक राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद का सवाल है, तो ये सब से पहले राजशाही ने अंधराष्ट्रवाद का बीज बोया था जिससे हमारे लोकतंत्रवादी या साम्यवादी किसी भी खेमे की नेतृत्व पंक्ति उबरने का नाम नहीं ले रही है ।
    आपने हिंदी में ये आलेख लाया है, आप के लिए यह अतिरिक्त योग्यता मानी जाती है जैसे मोदी जी ने अपने वक्तव्य का आरंभ नेपाली में किया था । परंत हमारी तो ना नेपाली स्वीकार्य है ना हिंदी । नेपाली पढ़ते-लिखते उमर गुजर गई परंतु हमेशा उपहास के पात्र रहे । अगर हिंदी में कुछ लिखूँ-पढ़ूँ तो तुरंत हमारी राष्ट्रीय पहचान संकट में आ जाती है । हम केवल हमारी इस दुर्गति का ही हल निकल जाए तो बहुत कुछ सकारात्मक हो सकता है ।

  2. Gopal Thakur Says:

    आदरणीय अधिकारी जी,
    नमस्कार !
    आपका आलेख ठीक समय पर आया है । विषयवस्तु को आपने ठीक ढंग से उठाने का प्रयास किया है । दुर्भाग्य तो हमारा ही है कि हम देश को कभी सपांग समझ ही नहीं सके । यहाँ जो असंतुष्टियाँ अभी दिख पड़ी है, क्या हमने सच्चे मन से इसकी जड़ तक पहुँचने का प्रयास किया है । निश्चय ही हम अगर अपने परिवार के सदस्यों के मनोविज्ञान को नहीं समझेंगे तो कोई इसका फायदा तो उठाएगा ही ।
    जहाँ तक राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद का सवाल है, तो ये सब से पहले राजशाही ने अंधराष्ट्रवाद का बीज बोया था जिससे हमारे लोकतंत्रवादी या साम्यवादी किसी भी खेमे की नेतृत्व पंक्ति उबरने का नाम नहीं ले रही है ।
    आपने हिंदी में ये आलेख लाया है, आप के लिए यह अतिरिक्त योग्यता मानी जाती है जैसे मोदी जी ने अपने वक्तव्य का आरंभ नेपाली में किया था । परंत हमारी तो ना नेपाली स्वीकार्य है ना हिंदी । नेपाली पढ़ते-लिखते उमर गुजर गई परंतु हमेशा उपहास के पात्र रहे । अगर हिंदी में कुछ लिखूँ-पढ़ूँ तो तुरंत हमारी राष्ट्रीय पहचान संकट में आ जाती है । केवल हमारी इस दुर्गति का ही हल निकल जाए तो बहुत कुछ सकारात्मक हो सकता है ।

  3. m. r. fua Says:

    well done, dr. adhikary,
    but your this
    piece can reach a wider audience
    if rendered in english langauge.
    pl. consider this suggestion.
    thanks.— m. r. dua

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