नेपाल में मीडिया उद्योग : 1990 से 2012

नेपाल में मीडिया उद्योग : 1990 से 2012
(Note: This article was written on 11 April 2013. And, it was presented in a seminar in New Delhi, India.)

नेपाल में मीडिया उद्योग : 1990 से 2012
डा. निर्मलमणि अधिकारी
काठमांडु विश्वविद्यालय

नेपाल प्रेस काउन्सिल नेपाल का वार्षिक प्रतिवेदन (कुछ माह पहले प्रकाशित) के अनुसार, प्रतिवेदन की वार्षिक अवधि में नेपाल में ८७४ अखबार प्रकाशित पाए गए । उन अखबारों में १६५ दैनिक, ४ अर्धसाप्ताहिक, ६६९ साप्ताहिक और ३६ पाक्षिक अखबार हैं । इनमें से कई ब्राडसिट दैनिक अखबार के अनेक सहरों से संस्करणें प्रकाशित होते हैं । अखबारों की विस्तार देखा जाए तो देश की राजधानी में संख्या ज्यादा जरुर है, लेकिन दूर दूर तक जिले जिले में भी अखबार निकल रहे हैं । प्रकाशित अखबारों में ज्यादातर नेपाली भाषा के हैं । इस का समुचित कारण भी है । नेपाल में एक सौ पच्चीस जातजातियां निवास करती हैं जिनका एक सौ तेइस प्रकार के मातृभाषायें हैं । इनमें नेपाली भाषा को नेपाल की राष्ट्रभाषा व आधिकारिक सरकारी भाषा का संवैधानिक व व्यावहारिक मान्यता प्राप्त है । नेपाली न सिर्फ नेपाल के पैंतालीस प्रतिशत लोगों की मातृभाषा है बल्कि करिब शतप्रतिशत लोग नेपाली भाषा को समझते और दैनिक जीवन में प्रयोग कर सकते हैं । इस हिसाब से राष्ट्रीय एकता के आधार को संवर्धन करने में नेपाली भाषा के मीडिया का भूमिका बहुत बडा दिखता है । इस वक्त नेपाल में ४०० से ज्यादा रेडियो स्टेशन का प्रसारण हो रहा है और इन में से कई तो बहुत दुर्गम ग्रामीण इलाकों में संचालित हैं । टेलिविजन की संख्या भी दो दर्जन हो गया है । इन्टरनेट प्रयोग करनेवाले भी २२ प्रतिशत हो गए हैं और अनलाइन न्यूजपोर्टल भी सौ से ज्यादा हो गए हैं । पिछले एक साल में नेपाल में करिब एक सौ फिचर फिल्म प्रदर्शन किए गए । विज्ञापन उद्योग भी वार्षिक करिब पाँच अरब नेपाली रुपये की कारोबार करनेवाला क्षेत्र माना जाता है ।

इश्वी संवत् १९९० के प्रारम्भ में काठमांडु के अलावा कुछ प्रमुख सहरों में ही अखबार निकलते थे और गोरखापत्र दैनिक ही सही मायने में एक मात्र राष्ट्रीय विस्तारवाला अखबार था । जो अखबार निकलते थे वो प्रायः पंचायत की समर्थन अथवा विरोध में बंटे हुए थे । देश में सिर्फ एक ही रेडियो प्रसारण होता था जो कि सरकारी रेडियो था । इसी तरह से सिर्फ एक ही टेलिविजन प्रसारण होता था जो कि सरकारी स्वामित्व में ही संचालित था । अनलाइन न्यूज पोर्टल का उस वक्त कोइ वजुद ही नहीं था । उस वक्त फिल्म भी बहुत कम संख्या में बनते थे । कुछ विज्ञापन एजेन्सियां जरुर थे, लेकिन इस को स्वयं में एक उद्योग मानने की स्थिति नहीं था ।
१९९० के प्रारम्भ से लेकर २०१२ के अन्त्य तक की इस अवधि में नेपाली मिडिया क्षेत्र ने जो प्रगति किया है इसके लिए सब से ज्यादा श्रेय १९९० अप्रैल में हुए राजनीतिक परिवर्तन और कुछ माह बाद निर्मित संविधान को दिया जाता है । उस वक्त नेपाल में पंचायत नाम से एक ऐसा राजनीतिक व्यवस्था था, जिस में सभी राजनीतिक दल प्रतिबन्धित थे, तसर्थ उसे निर्दलीय व्यवस्था कहा जाता था । तीस साल से चला आ रहा पंचायती व्यवस्था में जो संविधान बहाल था उस में वाक् स्वतन्त्रता का उल्लेख तो जरुर था, लेकिन स्वतन्त्र पत्रकारिता की बहुत कम गुंजायस था । सरकार की आलोचना करना पग पग में खतरे को निमन्त्रण देना होता था । न्यायपालिका की सक्रियता ही अखबारों और पत्रकारों का रक्षा कवच था । लेकिन कानुनी प्रावधान ही स्पष्टतः अनुदार होने से न्यायपालिका की भूमिका की भी एक हद थी । सरकारद्वारा पंचायती व्यवस्था के दौरान में कइ अखबारों के रजिस्ट्रेसन खारिज किए गए थे । कइ बार तो पत्रपत्रिका छपाइ करने वाले छापाखाना तक जब्त किए जाते थे । तसर्थ पत्रपत्रिका और छापाखाने में बडी लगानी करने से व्यवसायी निरुत्साहित ही रहे । बहुत कम आर्थिक लगानी में जो पत्रपत्रिका निकलते थे वो व्यवसाय करने से ज्यादा राजनीतिक मिसन के लिए प्रतिबद्ध थे । रेडियो और टेलिविजन प्रसारण तो कानुनन सिर्फ सरकार ही कर सकता था ।
लेकिन १९९० में जो राजनीतिक परिवर्तन हुवा उसने परिस्थिति एकदम से बदल गया । बहुत बडे जनआन्दोलन के बाद नेपाल में राजनीतिक परिवर्तन हुआ और देश में बहुदलीय प्रजातन्त्र की पुनः स्थापना हो गया । उस के बाद जो संविधान बनाया गया उस में बहुत ही उदार प्रावधान रखा गया । नये संवैधानिक प्रावधान के तहत प्रिन्ट, रेडियो और टेलिविजन सब क्षेत्र में निजी क्षेत्र की इन्वेस्टमेन्ट के लिए दरबाजा खुला । संविधान में ही ये सुनिश्चित किया गया कि कोइ भी अखबार की रजिस्ट्रेसन खारिज नहीं किया जा सकता और कोइ भी छापाखाना भी जब्त नहीं किया जा सकता । सरकार ने देश में खुला बाजार की नीति भी अवलम्बन किया । कूल मिलाकर देश में प्राइवेट सेक्टर के इन्वेस्टमेन्ट के लिए माहौल बना । कान्तिपुर मीडिया समूह की स्थापना इस दिशा में एक मील का पत्थर बना । इस की सफलता ने नेपाली मिडया उद्योग में एक नया अध्याय प्रारम्भ किया । आज नेपाल में कई बडे मीडिया हाउस जो आए हैं इन के प्रेरणा और आदर्श कान्तिपुर मिडिया समूह ही रहा है । लेकिन कान्तिपुर मीडिया समूह को न्यूजपेपर, म्याग्जिन, टेलिविजन, रेडियो और आनलाइन सब तरह के मीडिया संचालन की जो स्वीकृति दिया गया है उसे लेकर कई तरह की चिन्ता और आलोचना भी किया जा रहा है । इस से एक ही मीडिया हाउस की अवांछित हद तक प्रभाव व प्रभुत्व जैसी स्थिति बन गयी है ।
रेडियो सगरमाथा एफ.एम. की प्रसारण से देश में पहला गैरसरकारी रेडियो प्रसारण का नींव पडा । आज देश भर में जितने रेडियो स्टेशन हैं उन में से कई अपने को सामुदायिक व गैरमुनाफा मीडिया संस्था की तौर पर संचालन कर रहे हैं । इस से जनसेवी प्रसारण की नींव पडने की उम्मीद किया जा रहा है । नेपाल में एफ.एम. रेडियो का विस्तार जितनी तेजी से हुवा उस से साधारण जनसमूह तक समाचार संप्रेषण का बाढ सा आया । चूँकि रेडियो प्रसारण मूलतः स्थानीय स्तर पर केन्द्रित था प्रसारकों ने स्थानीय भाषाओं में भी थोरबहुत ध्यान दिया और समाचार संप्रेषण का बहुभाषी स्वरुप देखा गया । लेकिन स्थानीय रेडियो प्रसारण से विदेशी संगीत का अपूर्व विस्तार का दरबाजा भी तेजी से खुला । अब रेडियो स्टेशनों के संख्या की अधिकता तो हो गयी है लेकिन रेडियो स्टेशनों के कार्यक्रम की गुणवत्ता और एंकरों की भाषा पर चिन्ता किया जा रहा है । उदार संवैधानिक प्रावधानों का सकारात्मक असर टेलिविजन क्षेत्र में भी दिखा । ये प्राइवेट सेक्टर की भागिदारी की नए क्षेत्र के रुप में विकास हुए । आज कई चैनल तो चौबिसों घण्टे न्यूज चैनल के रुप में प्रसारण कर रहे हैं । अब सिर्फ राजधानी काठमांडू में ही नहीं देश के अन्य सहरों में भी टेलिविजन चैनल आ रहे हैं ।
आनलाइन मीडिया भी नेपाल में बहुत तेजी से विकास हो रहा क्षेत्र है । न सिर्फ बडे मीडिया हाउस इस को प्रयोग कर रहे हैं, साथ में हर जिला व सहर से स्थानीय तौर पर साइबर जगत में उपस्थिति बढता जा रहा है । सामाजिक संजाल और ब्लाग में नेपाली भाषा में कान्टेन्ट बहुत आ रहे हैं । कई बार तो मैनस्ट्रीम मीडिया में दबाया जाने वाले मुद्दे को सामाजिक संजाल और ब्लाग के जरिए एजैण्डा की रुप में आगे लाया जा सका है ।
जहां प्रिन्ट मीडिया, रेडियो, टेलिविजन और आनलाइन में उत्तरोत्तर विकास हो रहा है फिल्म उद्योग की कहानी थोडी सी अलग है । १९९० के बाद एक बार तो फिल्म उद्योग की विकास बहुत तेजी से हुवा । लेकिन करिब एक दशक बाद ही इस का अवनति प्रारंभ हुवा और अब तक फिल्म उद्योग उस से उबर नहीं पाया है ।
ऐसा नहीं कि १९९० से २०१२ तक की अवधि में नेपाल की मीडिया उद्योग ने सिर्फ चहुंमुखी विकास ही देखा हो । इस बीच में करिब एक दशक तक देश में जो माओवादी समस्या चलता रहा उस दौरान कई मीडियाकर्मी की भी हत्या हुआ और कई तो अब तक लापता हैं । इस बीच देश में दो बार इमरजेन्सी भी लगी और दोनों इमर्जेन्सियों के दौरान पूरे देश के साथ मीडिया उद्योग को भी बहुत कष्ट पहुंचाया । फिर बाद में राजतंत्र की उन्मूलन और गणतंत्र की बहाली के बाद देश के कई हिस्सों में जातीय व क्षेत्रीय आधार पर हुए आन्दोलनों के दौरान भी पत्रकारों पर शारीरिक हमले हुए हैं ।
वर्तमान में नेपाल की मीडिया उद्योग का जो विस्तार दिखा जा रहा है उस के साथ में एक चिन्ता ये भी है कि संख्या की आधार पर जितना विस्तार हो रहा है ये बहुत ज्यादा है । राष्ट्रीय जनगणना २०११ के अनुसार, नेपाल की कूल जनसंख्या करिब दो करोड पैंसठ लाख है और विज्ञापन उद्योग को वार्षिक करिब पाँच अरब नेपाली रुपये की माना गया है । इतने लोगों और इतना छोटा विज्ञापन बाजार के लिए ८७४ अखबार, ४०० से ज्यादा रेडियो स्टेशन और दो दर्जन टेलिविजन चैनल को विशेषज्ञ ज्यादा संख्या मान रहे हैं ।
मीडिया में संपादकीय स्वायत्तता व स्वतन्त्रता का स्थान कमजोर होता जा रहा है और मीडिया के मालिक, विज्ञापनदाता व कार्पोरेट जगत का प्रभाव बढता जा रहा है । जहां मीडिया के कई मालिक दिन प्रतिदिन और ज्यादा धनी बनते दिख रहे हैं वहीं पत्रकार और अन्य मीडियाकर्मियों को न्यूनतम पारिश्रमिक तक नहीं मिल रहा है । राजनीतिक पार्टीयों का प्रभुत्व भी मीडिया उद्योग में बहुत ज्यादा बढ रहा है । नेपाल में कार्यरत पत्रकारों में स्वतन्त्र पत्रकार ढूंढना उतना ही मुश्किल हो गया है जितना कि खरगोश के सिङ । पत्रकार महासंघ कांग्रेस और कम्युनिष्ट पार्टीयों के राजनीतिक रस्साकस्सी का एक और मंच के तौर पर सिमट कर रह गया है । कांग्रेस और कम्युनिष्ट पार्टीयों के अलावा अन्य पार्टीयों ने भी पत्रकारों के लिए अपने संगठन स्थापित किया है । कूल मिलाकर पत्रकारों के बीच इतने बिखराव है कि ये संगठन पेशागत हित के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं । २००६ के बाद नेपाल बहुत ही मुश्किल संक्रमण से गुजर रहा है । राष्ट्रीय एकता के परंपरागत आधार को अस्थिर किया जा चुका है और नए आधार अभी तक विकास नहीं हो सके हैं । ऐसी परिस्थिति में मीडिया का भूमिका और संवेदनशील हो गया है ।

2 Responses to “नेपाल में मीडिया उद्योग : 1990 से 2012”

  1. Abhas DR Says:

    With sincere appreciation for this article, my questions are following:
    1. करिब शतप्रतिशत लोग नेपाली भाषा को समझते और दैनिक जीवन में प्रयोग कर सकते हैं ? Dr. Adhikari, are you sure of it?
    2. चूँकि रेडियो प्रसारण मूलतः स्थानीय … Is it an error? चूँकि ?
    3. नेपाल में कार्यरत पत्रकारों में स्वतन्त्र पत्रकार ढूंढना उतना ही मुश्किल हो गया है जितना कि खरगोश के सिङ । Is it not too exaggerated? There is an association of freelance journalists, though not much active and not much in the front. But this does not mean they are lost, in my opinion.

  2. kamal kishore upadhyay Says:

    sr pranam maine yah aalekh padha sampadkiy, patrkaro ki isthiti or unka bikhrao, media me rajneet ki guspaith,media malikaan ka warchaswa jb tak hum patrakaro me ekta w nispakshta nahi aaye gi tab tak ye nahi mit sakta. apko mai karib karib do saal se janta hu.ap wanha jaroor badlaaw ki mishal banege.lekhani ke madhyam se apka prayas adwatiya hai…. pranam

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s


%d bloggers like this: